आज मैं मेरी डायरी के पन्नों में से एक पुरानी पन्ना आप सभी के समक्ष रख रही हूँ…..*

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😔*आज मैं मेरी डायरी के पन्नों में से एक पुरानी पन्ना आप सभी के समक्ष रख रही हूँ…..*

 

*आहोम राज्य की राजधानी शिवसागर दर्शन*

 

 

      24 दिसंबर 2004 ,शुक्रवार को हमारे “नटराजम् संगीत ओ चित्रकला विद्यालय के शिक्षक शिक्षिका तथा छात्र छात्रा और हमारे दो पड़ोसी चाची, माँ सभी रात की लगभग 1 बजे बस से शिवसागर के लिए रवाना हुए । ठंड का मौसम और बाहर कुहासा छाया हुआ था । रात की सन्नाटे को चीर कर हमारे बस आगे बढ़ने लगी और हमलोग भी कीर्तन भजन तथा गाना गाते गाते 25  दिसंबर  2004 शनिवार सुबह लगभग  6 बजे  शिवसागर शहर पहुंच गए । शहर के बीचोंबीच स्थित शिवदौल मन्दिर दर्शन किए । आज मन बहुत प्रफुल्लित हो गया क्योंकि बहुत दिनो से मन में आशा थी कि शिवदौल की दर्शन करूँ । आज वो आशा पूर्ण हुआ । हमारे नटराजम् संगीत ओ चित्रकला महाविद्यालय के छात्र छात्रा के साथ हमारे पड़ोसी दो महिलाएँ, मेरी माँ और छोटी बहन हम सभी मिलकर वहीं बैठकर चाय नाश्ता किया । 

      चाय नाश्ता करने के बाद मंदिर के निकट स्थित शिवसागर पोखर  देखी । जिसे आहोम राजा रुद्र सिंह ने बनवाया था । इतना बड़ा पोखर कि एक तट से दूसरे तट दिखाई नहीं देता,मानो कि सच में सागर है । देखकर मन हर्षित हो गया । फिर हम सभी उसी तट पर स्थित म्यूजियम देखा ।जहाँ आहोम राजाओं के कई चीज़ें संरक्षण करके रखे है । 

        लगभग 7.30 बजे हमारे बस चराइदेउ के लिए रवाना हुए । दो-ढाई घंटे के बाद हमलोग चराइदेउ के बामुनी मैदाम पहुंच गए । वहाँ आहोम राजाओं के समाधि बहुत ही शानदार ढंग से संरक्षण करके रखे है । 

     लगभग  दोपहर  12 बजे हमलोग गढ़गाँव के लिए रवाना हुए । वहाँ जाकर जो देखी, ओह मैं तो बहुत आश्चर्य हुआ । आहोम राज के समय न ही कोई मशीन थी न ही कोई कंक्रीट अथवा सीमेंट , फिर  भी कैसे इतना बड़ा महल बनाया है कि आज भी सुरक्षित है । जो राजाओं के महल थे। मालूम पड़ा कि ये महल बड़ा चावल, बतख के अण्डे और उड़द के डाल से बनाया गया है । तीन मोहल्ले का वो ‘कारेंग घर’ मुझे बहुत पसंद आया ।

       फिर वहाँ से हमलोग शिवसागर शहर के लिए रवाना हुए ,  जहाँ ‘तलातल घर’ है । वहाँ आते आते तीन बज गए । तलातल घर आकर देखा कि सच में वहाँ एक रास्ते से अंदर जाए तो निकलने के लिए थोड़ा मुश्किल है । फिर अब कुछ रास्ते बंध कर दिया गया है । मालूम पड़ा कि मुगलों के आक्रमण के समय  ये घर बनाये थे । यहाँ से चराइदेउ बामुनी मैदाम तक गुप्त पथ थे । यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर जयदौल है । जयदौल जयसागर पोखर के तट पर है । जयदौल भी आहोम राजा रुद्र सिंह ने अपनी माता जयमती की याद में बनवाया था । सती जयमती को जेरेंगा पथार में लरा राजा ने शास्ति दी थी और जयमती ने देश के भलाई के लिए मृत्यु को अपनाया था । वहीं पथार को खोदकर जयसागर पोखर बनवाया । कितने विशाल है वो पोखर जैसे आज भी जयमती की कहानी बता रहे है । 

      वहाँ से निकलकर हमलोग वहा थोड़ी ही दूरी पर स्थित रंगघर देखने गए । पहले पार्क में गए । पार्क बहुत ही सुंदर ढंग से सजाया हुआ है । फूलों की बगिया, खेलने के लिए सामान साथ ही भैंस के लड़ाई करता हुआ दो मूर्ति । फिर रंग घर में गए । रंग घर इतने सुन्दर और कारीगरी कौशल से बनवाया है कि बोला न जाए । वहाँ से राजा मंत्री आमोला विषया सभी खेल कुद और रंगारंग कार्यक्रम देखते थे । उस महल को उसी ढंग से सजाया था । 

        अब लगभग पांच बजनेवाले है ।सभी ने होटल में खाना खाये और तेजपुर के लिए बस से रवाना हुए । आज आहोम राजधानी शिवसागर को नजदीक से देख कर खुद को धन्य माना । आज बहुत थक गई हूँ,  इसलिए डायरी के पन्नों पर इतना ही लिख पाया । अब सोने के लिए चलती हूँ ।

 

                  वाणी बरठाकुर “विभा”

                  तल गेरेकी, तेजपुर, 

                    शोणितपुर, असम

                    पिन- 784001

     

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